धरती पर जीवन की कहानी, जानिए

हिमयुग ने ऐसे रास्ते बनाए जिससे दुनियाभर में इंसान फैलने लगे थे। हालांकि जब हिमयुग युग खत्म हुआ तो धरती पर एक ऐसी क्रांति का जन्म हुआ जिसने आधुनिक मानव को गढ़ा ही नहीं बल्कि एक ऐसी धरती का निर्माण किया जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि जारी...

धरती पर जीवन की कहानी, जानिए
dharti par jeevan ki kahani
स्तनधारियों का युग : .....लेकिन तभी बाजी पलट गई। साढ़े छह करोड़ साल पहले करीब 10 किलोमीटर लंबी चौड़ी उल्लापिंड धरती से टकराई और धरती के इतिहास ने एक नई करवट ली। चारों ओर आसामान में धूल के बादल छा गए। धूल के इन बादलों से लंबे काल तक सूर्य की किरणें धरती को छू नहीं पाई और इसके चलते तापमान तेजी से गिरने लगा। इस भयानक घटना से धरती पर रहने वाला रह वह जीव मर गया जिसका वजन 25 किलो से ज्यादा था। ऐसे में डायनासोर का बचना तो असंभव ही था। यह इस धरती के इतिहास की सबसे सुखद घटना थी। जब डायनासोर खत्म हुए तो स्तनधारियों को आगे बढ़ने और विकसित होने का मौका मिला। वे अब खुलकर जी सकते थे।
डायनासोर के खत्म होने के कुछ साल बाद ही पहले वानर अस्तित्व में आए। पांच करोड़ साल पहले हमारे ये पूर्वज धरती पर विकसित हो रहे थे। उस समय धरती बहुत गर्म थी। वह इतनी गर्म थी कि उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर भी जंगल हुआ करते थे। बर्फ का नामोनिशान नहीं था। बर्फ की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
 
धीरे-धीरे महाद्वीप अलग होने लगे। अफ्रीका एवं अमेरिका ने अपना एक मुकम्मल रूप ले लिया। लेकिन नार्थ अफ्रीका अर्थात आज का इजिप्ट एक प्राचीन समुद्र के अंदर था। उस समुद्र के तल पर खोल वाले छोटे-छोटे जीव रहते थे। उनके खोल समुद्र में कई सालों तक जमा होते रहे और उनके खोल से चूना पत्थर बना। वो चुना पत्थर जिनसे बाद में पिरामिड बनाए गए।
 
आप कल्पना कर सकते हैं कि एक करोड़ वर्ष पहले धरती वह रूप लेने लगी थी जिसे आज हम देख रहे हैं। हमारी धरती का वर्तमान स्वरूप एक करोड़ वर्ष पुराना है। कोलाराडो नदी ग्रैंड केनियन बनाने लगी थी। हिमालय जैसी पर्वतमालाएं खड़ी होने लगी थी। हिमालय की पर्वतमालाएं इतनी ऊंची थी कि उन्होंने धरती को दो हिस्सों में ही नहीं बांटा था बल्कि मौसम का मिजाज भी बदल दिया था। हिमालय और इसके जैसी पर्वत मालाएं सूर्य की किरणों को दूसरी ओर जाने से रोकने लगी। उससे धरती का एक हिस्सा गर्म तो दूसरा ठंडा होने लगा। पनामा का स्थलडमरूमध्य अब नार्थ और साउथ अमेरिका को जोड़ने लगा था। इसके बाद अटलांटिक और प्राशांत महासागर एक दूसरे के करीब आए तो महासागरों में उफान आ गया और दुनिया आइस युग की ओर जाने लगी।
 
हलांकि धरती के ठंडी होने के बावजूद हमारे वानर पूर्वज गर्म इलाकों में ही बने रहे। लेकिन धरती पर एक ऐसी वनस्पति उभरने लगी जो वानरों और पेड़-पौधे के वजूद के लिए खतरा बन गई थी। 70 लाख साल पहले हमारे वानर पूर्वज पेड़ों पर मजे में रहते थे। लेकिन उनके आसपास के इलाकों पर घास फैलने लगी थी और पेड़-पौधे लुप्त होने लगे थे। हिंसक और खतरनाक जानवरों से बचने के लिए वृक्षों पर रहने वाले जीव और वानरों के लिए यह एक नई चुनौती थी। पहले जहां वानरों का एक या दो परिवार एक ही वृक्ष पर रहता था। वहीं अब वृक्षों पर वानरों की संख्या बढ़ने लगी। इससे वानरों के बीच बैचेनी और सामाजिक परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता था।
 
हालांकि हमारे और अन्य जीवों के वजूद के लिए घास सबसे अहम वनस्पति साबित हुई। दुनिया के करीब हर इलाके में एक ही वक्त पर घास के मैदान नजर आए। अफ्रीका से सवाना, यूरेशिया से नार्थ अमेरिका और अर्जेंटिना तक घास दुनिया में हर जगह थी। एशिया के जंगल भी घास से भरने लगे थे। घास के मैदानों ने हमारे वानर पूर्वजों के जंगलों में घुसपैठ कर ली थी। जब पेड़ कम बचे और उनके बीच दूरी बढ़ गई तो हमारे पूर्वजों को उनके मुताबिक ढलना पड़ा। एक ही पेड़ पर बहुत ज्यादा वानर रहते थे और खाने की कमी होने लगी थी।
 
ऐसे में उन्हें खाने की तलाश के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर जाना पड़ा और उन दो जगहों के बीच थे घास के मैदान। लेकिन पेड़ से नीचे उतर कर लंबा सफर करने में खतरा था। हालांकि कुछ ने यह खतरा मोल लिया और वे एक से दूसरी जगह पहुंच गए। हालांकि घास सभी जगह थी लेकिन यह नई जगह उन वानरों के लिए ज्यादा अच्छी थी जो दो पैरों पर चलते थे। वे लंबी घासों से सिर उठाकर अपने दुश्मनों पर नजर रख सकते थे। दो पैरों पर चलना एक बहुत ही अहम विकास था। क्योंकि उससे दोनों हाथ खाली रहते थे। हाथों ने मानव इतिहास को गढ़ा। कहना चाहिए की दो पैरों पर चलने की जिद ने एक क्रांति को जन्म दिया। खैर..
आइये जाने पत्थर का युग कब सुरु हुआ 
पत्थर का युग : 26 लाख साल पहले प्रोटोहुमंस या हॉमिनेट्स जिस दुनिया में घुमते थे वहां की धरती सिलिकान से भरी थी। सिलिकान ऑक्सिजन के साथ जुड़कर क्रिस्टल बनाता था जिससे ठोस पत्थर बनते थे। और, उस पत्थर को जब गढ़ा जाता तो वह टूटता नहीं था। उन्होंने इसे तोड़कर इससे धारदार हथियार बनाना सीख लिया था। पत्थर के इस मामूली हथियार से कई तरह के काम संपन्न होने लगे। पत्थर से नारियल जैसे सख्त खोल वाले फलों को फोड़ा जा सकता था। जानवरों की खाल को अलग किया जा सकता था। इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल करके जंगली जानवरों से बचा जा सकता था।
 
कुछ स्थानों में जानवरों की हडिडयों से भी औजार और हथियार बनाए जाने के सबूत मिले हैं। पत्थरों के बडें टुकड़ों से, जो आदमी की मुट्ठी में आ सकते हैं, हथोड़े, कुल्हाड़ियां और तरांते बनाए जाते थे। आंरभ में बिना मूठ की कुल्हड़ियों से ही पेड़ आदि की टहनियां काटी जाती थीं। बाद में उसे डंडे से बांध दिया गया, जिससे उसकी शक्ति और बढ़ गयी। औजारों के उपयोग से आदमी को बड़ा लाभ हुआ। इनसे वह जानवर मारने, शिकार करने, जमीन खोदने और लकड़ी को शक्ल देने में समर्थ हुआ।
 
चलिए जाने आग की खोज कब और कैसे हुआ 
आग की खोज : धरती पर आग लगने के दो कारण थे:- पहला तो है पेड़ पौधे और दूसरा है ढेर सारी ऑक्सीजन। होमोसेपियंस ने आग के इर्दगिर्द अपनी दुनिया बनाई थी। क्योंकि आग से एक ओर जहां वे जंगली जानवर एवं ठंस से बचते थे वहीं वे इसके माध्यम से अंधकार को भी मिटा सकते थे। आग का एक और उपयोग वे गोश्त को पकाने में भी करने लगे थे। वे जहां भी जाते अपने साथ जलती हुई आग को ले जाते थे। रात के समय जब सभी लोग गुफा में जमां हो जाते, तो गुफा के मुहं पर जलती हुई आग को रख दिया जाता था। आग के डर से जानवर गुफा के भीतर नहीं आते थे। शीतकाल में तूफानी रातों में आग ही उन्हें आराम तथा सुरक्षा प्रदान करती थी। धीरे धीरे हमारे पूर्जजों ने आग के भिन्न भिन्न उपयोग को करना सीख लिया था लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि आग लगती या जलती कैसे और किस उपाय से। आग की खोज सयोंग से हुई थी। चकमक पत्थर के दो टुकडों को आपस में टकराने से एक चिनगारी उठी, और जब वह सूखी पत्तियों और टहनियों पर गिरी तो उनमें से आग निकली। आग एक अजूबा थी। इस प्रकार, आग की खोज को हम एक महान खोज कह सकते हैं।
 
हमारे पूर्वजों ने 8 लाख साल पहले ही आग को काबू में रखना सीख लिया था। आग का प्रयोग हमारे इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी। आग पर खाना पकाकर खाने का मतलब था कि हम नए युग में प्रवेश कर गए थे। इससे अतिरिक्त ऊर्जा और ताकत मिलती थी। आगे जाकर इसका अनेक कामों में इस्तेमाल किया गया और इससे रहन-सहन में बड़ा सुधार हुआ। आग के कारण ही जल्द ही हमने मिट्टी से बर्तन, धातु से हथियार बनाना बनाना सीख लिया था।
आइये जाने भाषा का युग कब हुआ 
 
भाषा का युग : दो लाख साल पहले आज के इंसान ने अपना नया रूप ले लिया था। लेयरिंग यानी आवाज की जो नली हमारे पूर्वजों में उपर थी वह नीचे आ गई थी जिसके चलते ज्यादा जटिल आवाज निकालने की क्षमता आ गई थी। हमने बोलना शुरू कर दिया था। पहली बार कोई जानकारी एक से दूसरे इंसान या एक से दूसरी पढ़ी तक पहुंचने लगी थी। संप्रेषण की इस विधि के चलते इंसानों ने दूसरे जीवों के मुकाबले ज्यादा अहम फायदा पा लिया था।
 
दो पैरों पर चलना, हाथों में हथियार रखना, आग का इस्तेमाल करना और पशुओं से अधिक उन्नत भाषा में बात करना इंसान के लिए सबसे अहम क्रांति थी। इसी के कारण प्रारंभिक इंसानों के लिए अब पुरी दुनिया खेल, रोमांच और रहस्य का एक मैदान बन गई थी। एक लाख साल पहले इंसान कहीं दूर तक जा सकता था, क्योंकि उसके पास फूर्तिले हाथ थे, धारदार हथियार थे, समूह में रहने की समझ थी और वह शिकार करना सीख गया था। वह बात कर सकता था। आग को काबू में रखकर उसका इस्तेमाल कर सकता था और पहले से कहीं अधिक निडर हो गया था। 
 
यह क्रांति महाद्वीपों के अलग होने जैसी थी। घास के मैदानों को पार कर कहीं ओर रहने वाले वानर अब इंसान बन गए थे और वे अब कहीं ओर जाकर एक मार्ग बना रहे थे। यदि यह मान भी लिया जाए‍ कि प्रारंभिक इंसान अफ्रीका में रहते थे तो वे वहां से निकलकर कहीं और जाने लगे थे। कहीं ओर जाने का अर्थ है कि हमारे पूर्वज प्राकृतिक बदलावों से खुद को बचा रहे थे। खासकर वे भोजन की तलाश में भी भटक रहे थे।
 
लेकिन हमारे पूर्वज जब हमारे लिए रास्ता बना रहे थे, रहने का स्थान बना रह थे तब उस दौर में आईसएज शुरू हो गया। करीब 50 हजार वर्ष पहले ग्लैशियर उत्तरी ध्रुव से आगे बढ़ने लगे थे। इसी दौर में दुनिया की खोज पर निकला इंसान ऑस्ट्रेलिया और चाइना तक पहुंच गया। 30 हजार वर्ष पहले होपोसेपियंस पहली बार योरप पहुंच गए। बीस हजार वर्ष पहले जब बर्फ युग अपने चरम था जब इंसान अपनी जिज्ञासा के चलते उत्तर पूर्व के साइबेरिया के गहन बर्फिली जगहों तक पहुंच गया। वहां उसने गुफाओं में रहकर खुद को बचाया और उन गुफाओं में अपने रहने के निशान भी छोड़ दिए। जब धरती का ज्यादातर जल बर्फ में बदल गया तब महासागरों का जल स्तर सौ से सवा सौ मीटर नीचे चला गया। अब धरती पर अन्य क्षेत्रों में पहुंचने के भी मार्ग बन गए थे। साइबेरिया से निकलकर मानव मेरिंग लैंड ब्रिज को पार कर नार्थ अमेरिका में पहुंच चुका था।
 
झाड़ पर रहने के युग से नीचे उतरकर मानव खानाबदोश हो गया था। यानी वे भोजन और आश्रय की तालाश में झुंड बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। आमतौर पर एक झुंड में कुछ पुरुष, स्त्रियां तथा बच्चे होते थे। सुरक्षा की दृष्टि से, अकेले रहने की बजाए समूह बनाकर रहना बेहतर था। उन दिनों का जीवन सचमुच ही बड़ा कठिन था, क्योंकि लोग पेड़ों के फल-फूल, जंगली पौधे खाते थे और जो जानवर मिल जाते उनका शिकार करते थे। वे शाक-भाजी या अनाज पैदा करना नहीं जानते थे। इसलिए जब वे एक स्थान पर मिलने वाली सभी वस्तुओं को खाकर खत्म कर देते या अधिकांश पशुओं का शिकार कर लेते तो अन्य शिकार या भोजन की तालाश में अन्य किसी स्थान की ओर कूच कर जाते थे। इस दौरान उन्हें यदि कहीं गुफाएं मिलती थी तो वे वहीं अपना ठीकाना बना लेते थे। अन्यथा वे बड़े पेड़ों की पत्तों वाली शाखाओं के बीच अपने लिए शरण-स्थान बना लेते थे। उन्हें दो चीजों का भय रहता था- मोसम और जंगली जानवरों का।
 
12 हजार ईसा पूर्व इंसान साउथ अमेरिका तक पहुंच गया था। वहां इंसान का सामना हिमयुग की मुश्किलों से हुआ। इन मुश्लिों से पार पाकर इंसान ने खुद उस माहौल में ढाला और एक नए इंसानी युग की शुरुआत की। अब इंसान समंदर किनारे से पहाड़ की ऊंची चोटियों तक, घास के हरे भरे मैदानों से लेकर रेगिस्तानों तक और बर्फ के जंगल-पहाड़ों से लेकर ऊंचे पठारों तक फैल चुका था। हर मौसम और हर जगह इंसान रह रहा था। हालांकि इंसानों के करीबी दूसरे वानर या चिंपांची अपने ही कुनबे और जंगलों में ही रहते थे।
 
हिमयुग ने ऐसे रास्ते बनाए जिससे दुनियाभर में इंसान फैलने लगे थे। हालांकि जब हिमयुग युग खत्म हुआ तो धरती पर एक ऐसी क्रांति का जन्म हुआ जिसने आधुनिक मानव को गढ़ा ही नहीं बल्कि एक ऐसी धरती का निर्माण किया जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि जारी...